उत्तराखंड की पहचान रही आयुष चिकित्सा व्यवस्था, लेकिन संसाधनों और नीतिगत उपेक्षा से जूझ रहा विभाग
उत्तराखंड को आयुर्वेद और योग की भूमि माना जाता है। हिमालयी जड़ी-बूटियों और प्राचीन चिकित्सा परंपराओं से समृद्ध इस देवभूमि में सदियों तक आयुर्वेद ही जनमानस के स्वास्थ्य का प्रमुख आधार रहा। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के विस्तार के साथ आयुर्वेद की महत्ता भले कुछ कम हुई हो, लेकिन इसकी उपयोगिता कभी समाप्त नहीं हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आयुष चिकित्सा पद्धति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने और इसे मुख्यधारा में लाने के प्रयासों का व्यापक स्वागत हुआ। योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा मिलने से इस क्षेत्र से जुड़े लोगों में नई उम्मीद जगी।
आयुष चिकित्सालयों में आरोग्य मंदिर, डिजिटल सुविधाएं, योग एवं प्राणायाम केंद्र जैसी व्यवस्थाएं विकसित की गईं, जिनका लाभ लोगों को मिल भी रहा है।
इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। आयुष चिकित्सकों द्वारा अपनी मांगों को लेकर किए जा रहे आंदोलनों से यह स्पष्ट होता है कि विभाग के भीतर समस्याएं गहरी हैं। अस्पतालों में कई स्थानों पर चिकित्सकों की कमी है तो कहीं फार्मासिस्ट नहीं हैं। दवाओं की उपलब्धता भी मांग के अनुरूप नहीं हो पाती, जिससे मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
योग और प्राणायाम के माध्यम से समाज को स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रशिक्षकों को उनके योगदान के अनुरूप मानदेय नहीं मिल पा रहा है। वहीं पंचकर्म और अन्य विशिष्ट आयुष विधाओं के संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों का भी अभाव बना हुआ है। प्रशिक्षित महिला चिकित्सकों की कमी भी एक गंभीर समस्या है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयुष विभाग को मिलने वाला बजट अभी भी उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। यदि विभाग को पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञ नेतृत्व मिले तो आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था कहीं अधिक प्रभावी बन सकती है।
विभाग के शीर्ष पदों पर आयुष चिकित्सा की गहरी समझ रखने वाले अनुभवी विशेषज्ञों की नियुक्ति से योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन संभव हो सकता है। मुख्यमंत्री की ‘मॉडल जिला चम्पावत’ की परिकल्पना को साकार करने के लिए आयुष विभाग को भी एक आदर्श मॉडल विकसित करना होगा। यदि चम्पावत में आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को संसाधनों, विशेषज्ञों और आधुनिक सुविधाओं से जोड़कर प्रभावी व्यवस्था बनाई जाती है तो यह पूरे उत्तराखंड ही नहीं, अन्य हिमालयी राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है।

